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वो तेरा मुझसे कुछ कहता है

यूँ जो तू तकता रहता है
आसमान को हर बार क्या
कोई रहता है इसमें
या फिर है कोई उम्मीद
जिसे तू हर पल तलाशता है।
***
 

हाँ है कोई दूर वहाँ 
उन तारों में जिसे
हर पल देखा करती थी मैं यहाँ
उसकी यादों से मुझे 
जिंदगी जीने की सीख मिलती है 
हौसला बुलंद होता है
उम्मीद मिलती है।

***

पर आसमान में जब 
काले बदल छाते हैं
और आशाओं पर पर्दा पड़ता है
तो चीर के मायूसियों को
मानो वह तारा मुझसे कुछ कहता है
की उठ अब तू कुछ खुद करके दिखा
मेरी यादों को दिल में ज़िन्दा रख
और ज़माने को ललकार के दिखा।

–XxXxX–

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© Rishika Ghai

 

भूली बिसरी गलियाँ

आज फिर ले आये मेरे कदम
मुझे उन भूली बिसरी गलियों में
जहाँ नन्हे नन्हे कदम
भरी दुपहरी में दौड़ा करते थे,
ना धूप की फिकर थी
ना गर्मी का एहसास था
जहाँ अब्बा-कट्टी से
दोस्ती का फैसला होता था|

याद है मुझे वो
पापा का मेले में ले जाना
और हर छोटी बड़ी
ख्वाहिशों की पूरती करना,
जहाँ माँ के आचल से लिपट के
सारे गम दूर हो जाते थे
आज फिर उन्ही
गलियों में लौट आई हूं।

ना जाने कहाँ खो गए वो पल
इस दौड़-भाग की ज़िंदगी में
चाहूं भी तो ना समेट
पाऊंगी उन खूबसूरत लम्हो को
जो कहीं खो से गये है
इन भूली बिसरी गलियों में ।

सृजन- ऋषिका

–XxXxX–

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